Wednesday, 30 April 2014

रोटियों सी जिंदगी

 रोटियों सी जिंदगी


खुले  आकाश  के  नीचे  अपना  चूल्हा जलता ,
तुम  उस  पर  हाथ  से  रोटियां  सेकती ,
मैं पास  बैठकर  तुम्हें  अपलक  निहारता ,
जब  तुम्हारी   आँखें  मेरी  आँखों  से  मिलती ,
तुम  भी  रोटियां  भूल  उनमें  खो  जाती ,
जिंदगी  रोटियों  सी  होती
सौंधा सा मीठा सा  स्वाद लिए,
और  उनपर
चिकत्तियों   सा  अपना  प्यार  होता ,
एक  दूसरे  की  आँखों  में
झांकते-झांकते  तुम  सिकती  रोटी  भूल  जाती
और  उस  पर  कुछ  ज्यादा ही चिक्कत्तियां  पड़ जाती |
फिर  भी  वो  मीठी  लगती  जब  हम  मिलकर  खाते |
तुम  एक  निवाला  मुझे  खिलाती ,
मैं  एक  निवाला  तुम्हें  खिलता |
                                          गौरव शर्मा

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