Wednesday, 14 May 2014

स्वपन जागेंगे....

स्वपन जागेंगे....
आँखें जब सोने को होंगी,
स्वपन जागेंगे |
जीवन के सुरभित सौभाग्य,
 यत्न मांगेंगे |
कितनी ही इच्छाएं अंतर्मन में,
छटपटाती रहती हैं,
कितनी ही आँसु स्मृतियों में,
पछताते रहते हैं|
सब अपने लिए थोड़ा थोड़ा,
मरहम मांगेंगे,
आँखें जब सोने को होंगी,
स्वपन जागेंगे |
कई प्रश्न समय के,
अनबूझे ही रहते हैं,
क्षण भी बात अपनी,
बीतने पर ही कहते  हैं|
भविष्य के कण नए नए सम्बोधन मांगेंगे,
आँखें जब.......|
कितनी घुटी हुयी
भावनाओं को पाला है,
गिरते हुए आंसूं को,
पलकों में संभाला है|
ये भी अपने लिए नया,
एक अर्थ चाहेंगे|
आँखें जब.............|
कितनी ही चेहरे
अपनत्व की आस जगाते हैं,
स्नेह सिक्त दृष्टि से,
प्रेम की प्यास बुझाते हैं|
एकांकीपन के सहमे एहसास,
झटपट भागेंगे,
आँखें जब ...........|
बहुत से कथनों के ,
गुणात्मक अर्थ होते हैं,
भोजे न जाएँ ऐसे वाक्य,
 व्यर्थ होते हैं|
भटके शब्द अपने लिए,
आशय मांगेंगे,
आँखें जब सोने को होंगी ,
स्वपन जगेंगे,
जीवन के सुरभित सौभाग्य,
यत्ने मांगेंगे|
भवैश्य बता रहा है,
वर्तमान झूठा है|
खुशियां मत ढूँढो ,तुमसे,
भाग्य  रूठा है|
फिर भी उनके साथ नया एक,
जीवन मांगेंगे,
आँखें जब सोने को होंगी,
स्वपन जागेंगे|

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