Thursday, 11 September 2014



मेरे मन के तर्क....


ज़िन्दगी जब-तब बेरहम बनती रही इसे बड़ा करने को, 
पर मन भी ज़िद पर अड़ा रहा बच्चा ही बना रहने को |



सपनों की रेज़गारी जोड़ता रहा मिट्टी की कच्ची गुल्लक में ,
ज़िन्दगी दौलत मानती रही सिर में चांदी इकट्ठी होने को |



गुल्लक कई बार टूटी, सपने बिखरे, कुछ खो भी गए, लेकिन,
दो ही रूपये बस और लगे उसे इस मायूसी से उबरने को |

मन कहता रहा, साँसें खर्च कर खुशियां दुहना महंगा है,
मैं तो गुल्लक हिला हिला कर सपने गिराता हूँ खर्चने को |

जीना नहीं कहते पलों को भुखमरों की तरह निगलने को,
चबाओ, स्वाद लो, पेट ही नहीं, मन भी अपना भरने दो |

बचकाने ख़्वाबों का नूर आँखों में बसा लो, उन्हें चमकने दो,
चाँद चाहिए न, उठो, लपको, ख्वाहिश को क्यों घुटने दो |

दिल चाहे जब तक श्रृंगार की कविता ही उसे रचने दो, 
उदास लफ़्ज़ों को जोड़कर करुणा का जाला मत लगने दो |

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