Sunday, 12 April 2015








                                दिल खफा -खफा सा है





खफा-खफा सा है

बुझा-बुझा सा है

ख्यालों की पेनि्सल से

ख्वाबों की तस्वीरें बनाता है

कुछ देर निहारता है 

फिर मिटा देता है

हौसले का कागज

रगड़ रगड़ कर

फट जाता है 

पिजरे में फसे चूहे सा बेचैन

रास्ता ढूढता है

अब थककर बैठ गया है

कुन्डी में अटकी जिदगी

कुतरता है

सहमा सहमा है

दिल खफा -खफा सा है।

2 comments:

  1. आपका ब्लॉग मुझे बहुत अच्छा लगा, और यहाँ आकर मुझे एक अच्छे ब्लॉग को फॉलो करने का अवसर मिला. मैं भी ब्लॉग लिखता हूँ, और हमेशा अच्छा लिखने की कोशिस करता हूँ. कृपया मेरे ब्लॉग पर भी आये और मेरा मार्गदर्शन करें.

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    1. असीम आभार ऋषभ
      आमंत्रण के लिए धन्यवाद

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