कृष्ण - यशोदा
"मैया में बढ़ो हो गयो"
कान्हा क्या आए, नन्द भवन मंदिर सा हो गया था। मंद मंद घंटियों के आवाज़ आती रहती थी। केसर, चंदन और मोगरे की सुगंध आती थी जिससे सुवासित होने के लिए हवा वहां से हटती ही नहीं थी। मोर बोलते थे जैसे कान्हा को आवाज़ लगा रहे हों।
आज भी वातावरण भिन्न ना था। नन्द का आंगन कृष्ण की पैजनिया और कमरबंदी के घुंघरुओं की झनकार पर इतरा रहा था।
माखन की गंध में लिपटे नन्हें कन्हैया के कजरारे नैन नंद भवन के आंगन के हर कोने से बतिया रहे हैं। मैया यशोदा स्नान की तैयारी कर रही हैं।
मैया बोलीं —“आ जा, कान्हा, आज तो खूब माटी में लोट आयो है। तोहे नहवा दूं तब माखन खाइयो।”
कन्हैया ने होंठ फुलाए, गालों पे हथेली रखी और बोले, “अरे मैया, अब तो मैं बड़ो हो गयो हूँ। तोसे नहावे में अब लाज आवे है।”
मैया हँस पड़ीं, “तू कब बड़ो हो गयो रे लाला?”
कन्हैया छाती तान के बोले, “देखो न मैया, अब तो मैं तीन बरस को हो गयो। बाबा भी कहत रहे थे, ‘हमार कन्हा अब सयानों हो गयो।’ कान्हा की बड़ी-बड़ी पलकें तितली के पंखों की तरह नृत्य कर रही थीं।
“अब मैं खुद नहाऊँगो, तुम जाओ।”
इतना कहकर कन्हैया ने मटकी उठाई, पर दो कदम चलते ही धप्प!
पानी गिर गयो, कन्हैया खुद भी भीग गयो।
मैया बोलीं, “अरे रे! यो है खुद नहाना?”
कन्हैया आँख मिचकाते बोले —
“मैया, पानी तो शरारती है, यो खुद गिर गयो। मैं तो ठीक ही कर रहो थो।”
मैं तो ठीक ही कर रहो थो।”
मैया ने जैसे ही आगे बढ़कर कन्हैया को गोद में उठाना चाहा,
कन्हैया झट से बोले —
“ना ना मैया! अब गोद में भी न उठाओ। लाला अब बड़ा हो गयो है।”
यशोदा जी ने रीझ कर कन्हैया की बलैया ली और अन्य कार्यों में लग गई।
कन्हैया दूसरी मटकी भर लाए। आधी भरी मटकी से जल छलक रहा था। ठुमकती चाल पर पैजनियां झनक रही थी।
मैया को दूसरे कार्यों में लगा देखा तो पहुंचे मैया के पास और
उनके आँचल को कसकर पकड़ के बोले, “देख मैया, बड़ों तो मैं हो गयो हूं। पर मैया… तुम यहीं बैठी रहियो। अकेले नहाने में डर भी तो आवे है।”
मैया यशोदा की आँखें भर आईं। वो कन्हैया को सीने से लगाकर बोलीं, “लाला, तू जितनो भी बड़ो हो जावै, मैया के लिए तो सदा नन्हो कन्हा ही रहेगो।”
कन्हैया मुस्काए। हाथों को मैया के गले में डाल बोले, “तो फिर मैया, आज तुम ही नहवा दो। कल से मैं सच में बड़ो हो जाऊँगो।”
मैया ने कन्हैया को हृदय से चिपका लिया।
© गौरव शर्मा
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