Tuesday, 20 May 2014

अंतर्द्वंद.....

गले हुए एहसासों को सम्भालूँ कब तक ...
उंगली लगाते ही चिर जाते हैं ....
आँखों की वेदना को क्या समझेंगे वो ,
जो शब्दों का भी गलत अर्थ लगाते हैं ....
भीड़ में उनके कंधे पर हाथ रखके कितना भी मुस्कुरालूं मैं ...
रिश्तों में लगे पैबंद सबको नज़र आते हैं ......

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