Monday, 23 June 2014

नन्ही उम्मीद
फिर बत्ती हुयी लाल,
फिर उम्मीदें हुईं गुलज़ार |
रुकीं गाड़ियां कितनी सारी,
आगे-आगे बड़ी बड़ी चार |

लपक कर आया मासूम,
आँखों में हसरत भरके |
उसकी विनती की कीमत शायद,
इक सिक्का कोई समझ ले |

एक हाथ शीशा खटखटाये,
फैला है दूजा नन्हा सा |
धड़कन दिल की, ज्यों घडी सेकंडों की,
ललचाये निहारे सहमा सा |

दोहराई विनती हुयी बेकार,
बड़ा अगली आज़माने को |
बीस झपकियाँ और बची हैं,
अबकी बार कुछ कमाने को |

दूसरे शीशे पर पहुंचा ही था,
पिछली कार से, चुटकी निकली बाहर |
पांच रूपये का छोटा सिक्का,
दयालू बड़ी ये छोटी कार |

सिक्का हाथों में, विस्मय आँखों में,
बिन मांगे कर गया उपकार |
बड़ी कार में बड़ा दिल होगा,
ये सोचना था बिलकुल बेकार |

सोचा उसने-
अगली कोशिश अगली बार करूँगा,
दस झपकियाँ ही तो बची हैं |
वैसे भी आगे-आगे,
बड़ी गाड़ियां ही तो फँसी हैं |

मेरी गरीबी, इनकी अमीरी में,
शायद अंतर इतना ज्यादा होगा |
ये जिनको भीख देते होंगे,
मेरा ओहदा उनसे भी आधा होगा |

मुझे तो ये भी मालूम नहीं है,
भरे पेट कैसा लगता है |
एक बार मेरा भी बदल जाये भाग्य,
जैसे बत्ती का रंग बदलता है...
जैसे बत्ती का रंग बदलता है |

                        गौरव शर्मा

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