Tuesday, 15 July 2014

यादों की साज़िश- एक कहानी कविता में
कभी कोई शय सारी की सारी धुप पी जाती है,
कभी बुझी रात में भी चिंगारी सुलग जाती है '
यादें भी मुझे रुलाने को
 कैसी कैसी साज़िशें रचाती हैं |

सूनापन परोसकर दबे पाँव,
अभी अभी दोपहर गुज़र गयी है |
उदासी की पोटली उठाये दूर,
कुटिल शाम दस्तक दे रही है |
बादल दिन की आँखों में,
जबरन काजल लगा देते हैं,
हवा भी फ़िज़ा को किरकिरे
आँचल में लपेटे है |

रुआंसे अकेलेपन को नकली मुस्कान
 मीठी गोली खिलाती है,
यादें भी मुझे रुलाने को
 कैसी कैसी साज़िशें रचाती हैं |

वक़्त के दिखाए सपनो से,
उमंग और ज़ज़्बात के वादों से,
मसरूफियत के कमरे में बंद,
मैं दूर ही रहता हूँ यादों से |
पर बांसुरी बेच रहा लड़का
बजाता है धुन भूले गीत की,
और गूँज जाती हैं बंद कमरे में,
प्यारी सी बातें रूठे मीत की |

उसकी मीठी बोली कानों को,
पिघले कांच सी लगती हैं,
यादें भी मुझे रुलाने को
 कैसी कैसी साज़िशें रचाती हैं |

जब कभी बादलों की मृदंग पर,
बूँदें नाचने लगती हैं,
मेरे खिड़कियों के कांच पर,
जानबूझकर बजती हैं |
मेरे ख्यालों के बागीचे में,
सूखी मिटटी महकने लगती है,
पलकें मूंदे, बाहें फैलाये,
वो फुहारों से खेलने लगती है|

उसका बारिश में यूँ अकेली भीगते,
दिखाकर यादें मुझे जलाती हैं,
यादें भी मुझे रुलाने को
 कैसी कैसी साज़िशें रचाती हैं |



एक चिड़िया जब जब दिखती,
आँखें मूँद मुराद मांग लेती थीं तुम |
हर बार मुरादों की गुल्लक भरके,
कितने खुश हो जाते थे हम |
किन्नर जब कभी मिल जाते थे,
तुम मुझसे पैसे दिलवाती थीं,
चुन्नी से ढककर सर अपना,
आशीर्वाद लेकर इतराती थीं |


वही झूठी चिड़िया खिड़की पर,
सुबह-शाम मुझे चिढ़ाती है,
यादें भी मुझे रुलाने को
 कैसी कैसी साज़िशें रचाती हैं |


दस रूपये के बदले में भिखारिन,
दुआओं की झड़ी लगा देती है,
मनचाहा साथी मिले मुझे,
चार बार दोहरा देती है |
मैं खीजकर उसे डपटता हूँ,
वो सहमकर चुप हो जाती है,
अच्छी दुआ पर मेरा भड़कना,
पगली समझ नहीं पति है |

बार बार बहाने से किस्मत,
मेरे घावों पर नमक लगाती है,
यादें भी मुझे रुलाने को
 कैसी कैसी साज़िशें रचाती हैं |


गौरव शर्मा


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