Wednesday, 23 July 2014

कविता की  मुक्ति

मेरे मरने की खबर 
 जब मिले तुमको ,
एक कमरे में कुछ देर को,
समेट लेना खुदको |
मूँद कर आखें अपनी ,
दो आंसू  गिरा  देना ,
दुःख  हुआ  है तुमको ,
बस  इतना  बता  देना |
हौले से एक बार
मेरा नाम बुदबुदा देना,
झूठी ही सही,
हलकी सी श्रदांजलि दे देना |
फिर  मनमें  दोहराना ,
मेरी  वही  कविता ,
जो  तुम्हें सबसे
अच्छी लगती  है  |
जानता  हूँ  तुमने  ,
बहुत  बार  पड़ी  है ,
पर  आखिरी  बार ,
कुछ  इस  तरह  पढ़ना ,
जैसे  पिंड-दान  के  समय ,
पुरखों  को  याद  करते  हैं |
हर  शब्द  को  महसूस  करना ,
हर  पंक्ति  का  तर्पण  कर  देना  |
वो  शब्द  जानते  हैं ,
तुम्हारे  लिए  रचे  गए  थे ,
निश्छल  थे , निष्पाप   थे ,
पर  मेरे  भाग्य  से  जुड़े  हुए  थे|
वो  भी तो छले गए  थे  |
कुछ  इस  तरह  पढ़ना,
हर  शब्द  को  मोक्ष  मिल  जाये ,
कवि  को  मिले  न मिले ,
कविता  को  मुक्ति  मिल  जाये  |


कहीं  लिखी  हो  तो ,
फाड़  लेना  वो  पन्ना ,
और  जला डालना ,
राख़ को  पलाश  के  पेड़
के  नीचे डाल आना |
फिर  खिड़की  पर  आ  जाना ,
एक  स्याह  छोटा  सा ,
बादल  उड़ता  दिखेगा ,
नज़रें  मिलते  ही ,
वो  मुस्कुरा  देगा ,
मेरी  रूह  का  तुमको ,
वो  आखिरी  सलाम  होगा  |
 जैसे  ही  वो  गुजरेगा ,
एक  सन्नाटा  पसरेगा ,
फुहारें  शुरू  हो  जाएँगी  ,
मेरी  बातें , हवा  के 
झोंकों  के  संग  ,
तुम्हारे  गालों  से टकराएंगी   |
तुम्हारी  लटें , उन  बातों  को ,
लपेटने  को  लहराती  होंगी ,
मेरा  कुछ  कहना ,
फिर  माफ़ी  माँगना ,
देखना  तुम  मुस्कुरा  दोगी |
यूँ  ही  दिन  गुज़र  जायेगा ,
वक़्त  एक नया  सवेरा  लाएगा ,
सब  कुछ  वैसा  ही  होगा ,
पर  पलाश  के  फूल ,
कुछ  और  सुर्ख  होंगे ,
मेरी  कविता  में  भावनाएं  ,
ही  इतनी  थीं  कि,
वो  कहीं  तो  रंग  दिखाएंगी हीं|




2 comments:

  1. वो शब्द जानते हैं ,
    तुम्हारे लिए रचे गए थे ,
    निश्छल थे , निष्पाप थे ,
    पर मेरे भाग्य से जुड़े हुए थे|
    वो भी तो छले गए थे |
    कुछ इस तरह पढ़ना,
    हर शब्द को मोक्ष मिल जाये ,
    कवि को मिले न मिले ,
    कविता को मुक्ति मिल जाये |
    बहुत सुन्दर शब्द और उतनी ही सुन्दर अभिव्यक्ति

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  2. बहुत आभार योगेश सारस्वत साहब

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