Tuesday, 20 May 2014

तुम और मैं 
 
आक्रोश कि अंगीठी पर,
मिट्टी की हान्डी में,
मेरी तुम्हारी
पौने दो मुलकातों की
यादें अब तक पक रही हैं
तुम्हरी झूम्ती लम्बी चोटी
अस्पष्ट भाव लिये तुम्हारी
घूरती आँखें
वो तिरछी मुस्कुराहट
और  व्यन्ग वाली बातें
अब बरसों के बाद
भुने हुये अतीत की खुशबू
आत्मीयता भरे वर्तमान में
 बिखरी है
मैं कितना भी झुठ्ला लूँ
मेरी जिन्दगी तुम्हारे खयालों से ही
निखरी है....

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