Monday, 2 June 2014

प्यार की परिभाषाएँ.....

हर युग में प्यार की नयी परिभाषाएँ होती हैं,
अब न मीराएँ होती हैं,
न राधाएँ होती हैं |

मेहंदी का सुर्ख होना,
बिंदी का काबिज़ होना,
लम्बी मांग भर लेना,
कबके ढोंग हो चुके हैं,
भावनाएं हथेली पर लेकर,
प्यार ढूंढने वाले,
कबके बोझ हो चुके हैं |
अब प्यार की ये निशानियाँ,
बाधाएं होती हैं,
अब न मीराएँ होती हैं,
न राधाएँ होती हैं |



आँखों को पढ़ने वाले,
ख़ामोशी सुनने वाले,
समर्पित, मर मिटने वाले,
कल की बात हो चुके हैं |
एक स्पर्श और जीवन डोर
से बंधने वाले,
आँखें और जुल्फों पर,
कविता कहने वाले,
खोखले ज़ज़्बात हो चुके हैं |
अब कोरी बातें नहीं,
सिक्कों की स्पर्धाएं होती हैं |
अब न मीराएँ होती हैं,
न राधाएँ होती हैं |

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