Monday, 9 June 2014

ये कैसी प्रेरणा है......

यादों की कटोरी  में,
उंगली डुबो डुबो के,
ख्यालों की दीवार पर,
खींचता हूँ लकीरें |

तुम्हारी कंजूसी वाली हँसी,
लटों पर झूठी नाराज़गी,
मन की आँखें बना डालती हैं,
कितनी ही तस्वीरें |

 आँखें तरेरती एक तस्वीर,
खुश रहने की कसम
याद दिलाती है,
और उसे निभाने की प्रतिज्ञा,
अचानक चौंक कर
 चूल्हा जलाती है |

मैं हौले हौले मुस्काता हूँ,
और अंतर्मन की कढ़ाई में
अवसाद भूनता हूँ |
टूटे सपनो की सूखी
 किशमिश मिला के,
सौहार्द सूंघता हूँ |

ये कैसी प्रेरणा है,
 जो नहीं है,
पर कहीं तो हैं फिर भी|
बांधें है, पर आज़ाद
होने को कहती है,
ये अजीब हैं ज़ंजीरें |

यादों की कटोरी में,
उंगली डुबो डुबो के,
ख्यालों की दीवार पर,
खींचता हूँ लकीरें |

        गौरव शर्मा.....

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Thanks for your invaluable perception.

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